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Sanchayita / Nirmala Jain.

संचयिता / निर्मला जैन. By: Language: Hindi Publication details: New Delhi : Vani Prakashan, 2013.Description: 278 pages ; 22 cmISBN:
  • 9789350724033 (hardback)
Subject(s): DDC classification:
  • 891.4309 JAI/S
Summary: 'संचयिता: निर्मला जैन' हिंदी साहित्य की प्रख्यात आलोचक, विदुषी और लेखिका डॉ. निर्मला जैन के उत्कृष्ट रचनात्मक अवदान को समेटने वाला एक बेहद महत्वपूर्ण ग्रंथावली संग्रह है, जिसे वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है। यह पुस्तक उनके दशकों लंबे साहित्यिक सफर, वैचारिक लेखन और आलोचनात्मक दृष्टि का एक प्रामाणिक और सुंदर दस्तावेज़ है। इस संग्रह के माध्यम से पाठकों को डॉ. निर्मला जैन की पैनी साहित्यिक समझ, भाषा-शिल्प और उनके अनूठे दृष्टिकोण को एक ही स्थान पर करीब से देखने और समझने का अवसर मिलता है। इस ग्रंथ में लेखिका के महत्वपूर्ण निबंधों, आलोचनात्मक लेखों, संस्मरणों और वैचारिक टिप्पणियों को बेहद सलीके से संकलित किया गया है। हिंदी आलोचना के क्षेत्र में स्त्री-विमर्श और समकालीन साहित्य के मूल्यांकन को एक नई दिशा देने में उनका योगदान अतुलनीय रहा है, जिसकी झलक इस पूरी पुस्तक में साफ़ दिखाई देती है। साहित्य के विद्यार्थियों, गंभीर शोधार्थियों और हिंदी आलोचना में गहरी रुचि रखने वाले प्रबुद्ध पाठकों के लिए यह संग्रह एक अनिवार्य, संग्रहणीय और बेहद मूल्यवान धरोहर है।
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Rajbhasha Book (Hindi) Central Library, IIT Bhubaneswar Rajbhasha Section Central Library, IIT Bhubaneswar Rajbhasha Section RB 891.4309 JAI/S (Browse shelf(Opens below)) Available RB1653
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'संचयिता: निर्मला जैन' हिंदी साहित्य की प्रख्यात आलोचक, विदुषी और लेखिका डॉ. निर्मला जैन के उत्कृष्ट रचनात्मक अवदान को समेटने वाला एक बेहद महत्वपूर्ण ग्रंथावली संग्रह है, जिसे वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है। यह पुस्तक उनके दशकों लंबे साहित्यिक सफर, वैचारिक लेखन और आलोचनात्मक दृष्टि का एक प्रामाणिक और सुंदर दस्तावेज़ है। इस संग्रह के माध्यम से पाठकों को डॉ. निर्मला जैन की पैनी साहित्यिक समझ, भाषा-शिल्प और उनके अनूठे दृष्टिकोण को एक ही स्थान पर करीब से देखने और समझने का अवसर मिलता है।

इस ग्रंथ में लेखिका के महत्वपूर्ण निबंधों, आलोचनात्मक लेखों, संस्मरणों और वैचारिक टिप्पणियों को बेहद सलीके से संकलित किया गया है। हिंदी आलोचना के क्षेत्र में स्त्री-विमर्श और समकालीन साहित्य के मूल्यांकन को एक नई दिशा देने में उनका योगदान अतुलनीय रहा है, जिसकी झलक इस पूरी पुस्तक में साफ़ दिखाई देती है। साहित्य के विद्यार्थियों, गंभीर शोधार्थियों और हिंदी आलोचना में गहरी रुचि रखने वाले प्रबुद्ध पाठकों के लिए यह संग्रह एक अनिवार्य, संग्रहणीय और बेहद मूल्यवान धरोहर है।

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