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Anya se ananya / Prabha Khetan.

अन्या से अनन्या / प्रभा खेतान. By: Language: Hindi Publication details: New Delhi : Rajkamal Prakashan, 2019.Edition: 6th editionDescription: 287 pages ; 22 cmISBN:
  • 9788126719310
Subject(s): DDC classification:
  • 891.43092 KHE/A
Summary: 'अन्या से अनन्या' डॉ. प्रभा खेतान की चर्चित आत्मकथा है, जिसमें उन्होंने अपने निजी जीवन, प्रेम, स्त्री-अस्मिता, सामाजिक रूढ़ियों और आत्मनिर्भरता के संघर्ष को अत्यंत बेबाकी से प्रस्तुत किया है। लेखिका ने एक रूढ़िवादी सामाजिक और पारिवारिक परिवेश में अपने बचपन और युवावस्था के अनुभवों से लेकर शिक्षा, व्यवसाय, साहित्यिक जीवन और व्यक्तिगत संबंधों तक की यात्रा को आत्मस्वीकृति के साथ अभिव्यक्त किया है। एक विवाहित पुरुष के साथ अपने लंबे भावनात्मक संबंध के अनुभव के माध्यम से वे प्रेम, निर्भरता, सामाजिक मान्यता और स्त्री की स्वतंत्र पहचान के प्रश्नों से जूझती दिखाई देती हैं। आत्मकथा में पितृसत्तात्मक व्यवस्था, स्त्री की सामाजिक स्थिति, भावनात्मक असुरक्षा और स्वतंत्र अस्तित्व की खोज प्रमुख विषय हैं। व्यक्तिगत अनुभवों के साथ लेखिका अपने समय के सामाजिक और आर्थिक परिवेश पर भी विचार करती हैं। यह कृति एक स्त्री के 'अन्या' अर्थात हाशिये पर स्थित अस्तित्व से 'अनन्या' अर्थात अपनी विशिष्ट और स्वतंत्र पहचान की ओर बढ़ने की आत्मसंघर्षपूर्ण यात्रा को प्रस्तुत करती है।
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Rajbhasha Book (Hindi) Central Library, IIT Bhubaneswar Rajbhasha Section Central Library, IIT Bhubaneswar Rajbhasha Section RB 891.43092 KHE/A (Browse shelf(Opens below)) Available RB1600
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Originally published in 2007.

Includes biographical and contextual notes.

'अन्या से अनन्या' डॉ. प्रभा खेतान की चर्चित आत्मकथा है, जिसमें उन्होंने अपने निजी जीवन, प्रेम, स्त्री-अस्मिता, सामाजिक रूढ़ियों और आत्मनिर्भरता के संघर्ष को अत्यंत बेबाकी से प्रस्तुत किया है। लेखिका ने एक रूढ़िवादी सामाजिक और पारिवारिक परिवेश में अपने बचपन और युवावस्था के अनुभवों से लेकर शिक्षा, व्यवसाय, साहित्यिक जीवन और व्यक्तिगत संबंधों तक की यात्रा को आत्मस्वीकृति के साथ अभिव्यक्त किया है। एक विवाहित पुरुष के साथ अपने लंबे भावनात्मक संबंध के अनुभव के माध्यम से वे प्रेम, निर्भरता, सामाजिक मान्यता और स्त्री की स्वतंत्र पहचान के प्रश्नों से जूझती दिखाई देती हैं। आत्मकथा में पितृसत्तात्मक व्यवस्था, स्त्री की सामाजिक स्थिति, भावनात्मक असुरक्षा और स्वतंत्र अस्तित्व की खोज प्रमुख विषय हैं। व्यक्तिगत अनुभवों के साथ लेखिका अपने समय के सामाजिक और आर्थिक परिवेश पर भी विचार करती हैं। यह कृति एक स्त्री के 'अन्या' अर्थात हाशिये पर स्थित अस्तित्व से 'अनन्या' अर्थात अपनी विशिष्ट और स्वतंत्र पहचान की ओर बढ़ने की आत्मसंघर्षपूर्ण यात्रा को प्रस्तुत करती है।

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