Aur pasina bahata raha / Abhimanyu Unnath.
Language: Hindi Publication details: New Delhi : Rajkamal Prakashan, 2024.Edition: 3rd edDescription: 319 p. : 22 cmISBN:- 9789389598384 (hbk.)
- 891.433 UNN/A
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Rajbhasha Book (Hindi)
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Central Library, IIT Bhubaneswar | Central Library, IIT Bhubaneswar | RB | 891.433 UNN/A (Browse shelf(Opens below)) | Available | RB1455 |
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| 891.433 TAG/M Madhur Milan / | 891.433 TRI/A Aur Phir / | 891.433 TRI/N Nangatalai ka gaon / | 891.433 UNN/A Aur pasina bahata raha / | 891.433 VER/L Lal teen ki chhat / | 891.433 VER/M Mujhe chaand chahiye / | 891.433 VER/P Parinde / |
मॉरिशस के प्रवासी भारतीय। हिन्दी कथाकार और कवि के रूप में मॉरिशस ही नहीं भारत में भी विशिष्ट ख्याति अर्जित की। अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने मॉरिशस में न केवल प्रवासी भारतीयों की अस्मिता को नई पहचान दी, बल्कि वहाँ भारतीय संस्कृति और हिन्दी भाषा व साहित्य का प्रचार-प्रसार भी किया। उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक, जीवनी आदि विधाओं में क़रीब 55 पुस्तकें प्रकाशित तथा 50 से अधिक हिन्दी नाटकों का लेखन। प्रमुख कृतियाँ : ‘लाल पसीना’, ‘गांधी जी बोले थे’, ‘नदी बहती रही’, ‘एक उम्मीद और’, ‘एक बीघा प्यार’ (उपन्यास); ‘ख़ामोशी के चीत्कार’ (कहानी-संग्रह); ‘नागफनी में उलझी साँसें’ (कविता-संग्रह); ‘देख कबीरा हाँसी’ (नाटक)।
मॉरिशस के हिन्दी-लेखकों में अग्रगण्य अभिमन्यु अनत अपने देश की मिट्टी से जुड़े कथाकार हैं। उनके उपन्यासों में मॉरिशस के आम आदमी की ज़िन्दगी, उसके सुख-दु:ख और हर्ष-विषाद का अत्यन्त आत्मीयतापूर्ण चित्रण है। आम आदमी यानी प्रवासी भारतीय, जो उस देश की आबादी में लगभग तीन-चौथाई हैं।
अभिमन्यु अनत ने लगभग डेढ़ दशक पहले एक ऐतिहासिक उपन्यास-त्रयी की कल्पना की थी, जिसमें भारतीयों के मॉरिशस पहुँचने पर अपनी अस्तित्व-रक्षा के लिए किए गए संघर्षों से प्रारम्भ करके वे उनकी आज तक की सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक-राजनीतिक स्थितियों के उतार-चढ़ाव को अंकित करना चाहते थे। इस त्रयी की पहली कड़ी ‘लाल पसीना’ में प्रवासी भारतीयों की वह संघर्ष-कथा अंकित है जो न केवल भारतीयों द्वारा अपनी अस्तित्व-रक्षा के लिए किए गए प्रयत्नों की कहानी है बल्कि मॉरिशस के निर्माण की कहानी भी है। दूसरी कड़ी थी ‘गांधी जी बोले थे’ जिसमें प्रवासी भारतीयों के सामाजिक-सांस्कृतिक उत्थान की कहानी है। प्रस्तुत उपन्यास और पसीना बहता रहा इस त्रयी की अन्तिम कड़ी है। आज से लगभग डेढ़ सौ साल पहले वहाँ जिस संघर्ष की शुरुआत हुई थी, वह अभी समाप्त नहीं हुआ है। अलबत्ता उसका रूप बदल गया है। आज भारतवंशियों के लिए वह अस्मिता की रक्षा का संघर्ष बन गया है। प्रस्तुत उपन्यास में इसी संघर्ष की कहानी है। किसी भी प्रवासी भारतीय द्वारा अपनी जातीय अस्मिता की कहानी को महाकाव्यात्मक गरिमा के साथ सम्भवत: पहली बार प्रस्तुत किया गया है, और इस दृष्टि से इस उपन्यास-त्रयी को हिन्दी कथा-साहित्य की एक उपलब्धि माना जाएगा।
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