Main behar mein hoon / Sunil Atolia ʻKaluʼ.
Language: Hindi Publication details: New Delhi : Vani Prakashan, 2026.Description: 250 pages ; 22 cmISBN:- 9789362876935 (paperback)
- 891.431 ATO/M
| Cover image | Item type | Current library | Home library | Collection | Shelving location | Call number | Materials specified | Vol info | URL | Copy number | Status | Notes | Date due | Barcode | Item holds | Item hold queue priority | Course reserves | |
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Rajbhasha Book (Hindi)
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Central Library, IIT Bhubaneswar Rajbhasha Section | Central Library, IIT Bhubaneswar Rajbhasha Section | RB | 891.431 ATO/M (Browse shelf(Opens below)) | Available | RB1660 |
'मैं बहर में हूँ' सुनील अटोलिया ‘कालू’ की हिंदी साहित्यिक कृति है। शीर्षक में 'बहर' का प्रयोग ग़ज़ल की छंद-व्यवस्था और लयात्मक संरचना की ओर संकेत करता है। ग़ज़ल-लेखन में बहर का महत्त्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि यह शेरों की लय, प्रवाह और छंदगत अनुशासन को निर्धारित करती है। इस लेख में लेखक अपने बचपन से ही पढ़ने-लिखने, कवि सम्मेलनों, मुशायरों और ग़ज़लों के प्रति अपने गहरे लगाव का वर्णन करते हैं। मिर्ज़ा ग़ालिब और जगजीत सिंह की ग़ज़लों से प्रभावित होकर उन्होंने लेखन शुरू किया, लेकिन शुरुआती रचनाओं को सँभालकर रखने के बावजूद उर्दू भाषा के पर्याप्त ज्ञान के बिना अपनी पहली पुस्तक ‘हफ़्ते दर हफ़्ते’ प्रकाशित करने में कई कठिनाइयों का सामना किया। कोविड-19 महामारी के दौरान उन्हें लेखन के प्रति अपने पुराने शौक को फिर से जीवित करने का अवसर मिला और धीरे-धीरे लेखन उनके लिए शौक से बढ़कर आवश्यकता बन गया। अपने अनुभवों से उन्होंने सीखा कि सफलता और असफलता के लिए व्यक्ति स्वयं जिम्मेदार होता है तथा गलतियों को स्वीकार कर उनमें सुधार करना ही आगे बढ़ने का सही मार्ग है। “ठुकराओ अब कि वाह करो, मैं बहर में हूँ” के माध्यम से लेखक अपने आत्मविश्वास, निरंतर सीखने और साहित्यिक सुधार के संकल्प को व्यक्त करते हैं।
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