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Eka kahani... khirki / Sandeep Yadav.

एक कहानी... खिड़की / संदीप यादव. By: Language: Hindi Publication details: New Delhi : Prabhat Prakashan, 2024.Description: 200 pages ; 22 cmISBN:
  • 9789355217479 (paperback)
Subject(s): DDC classification:
  • 891.433 YAD/E
Summary: 'एक कहानी... खिड़की' संदीप यादव का संवेदनशील हिन्दी उपन्यास है, जिसमें 'खिड़की' को परिवार के भीतर और बाहर के वातावरण के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाले प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेखक खिड़की के रूपक के माध्यम से पत्नी, परिवार और रिश्तों में संतुलन की भूमिका को समझाते हुए भारतीय पारिवारिक जीवन की अनेक जटिलताओं को सामने लाते हैं। कथा एक ऐसे बुजुर्ग दंपती और उनके बच्चों के परिवार के इर्द-गिर्द विकसित होती है, जिन्होंने सीमित साधनों में अपने बच्चों का पालन-पोषण कर उन्हें स्थापित किया है। समय के साथ परिवार में बढ़ती अपेक्षाएँ, तुलना, प्रतिस्पर्धा, आपसी अविश्वास, बहुओं और सास-ससुर के बीच उत्पन्न मतभेद तथा पीढ़ियों के बदलते दृष्टिकोण उनके जीवन में तनाव पैदा करते हैं। रचना में दांपत्य संबंध, स्त्री की पारिवारिक भूमिका, बुजुर्गों की उपेक्षा, संयुक्त परिवार के बदलते स्वरूप और सामाजिक मूल्यों में हो रहे परिवर्तन का मार्मिक चित्रण किया गया है। 'खिड़की' यहाँ केवल घर का वास्तु-तत्व नहीं, बल्कि प्रेम, संवाद, त्याग, अपनत्व और दो पीढ़ियों के बीच संबंधों को जोड़ने वाले भावनात्मक सेतु का प्रतीक बन जाती है। यह कृति पाठकों को परिवार में सामंजस्य, सम्मान, संवेदना और आपसी संवाद के महत्व पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।
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Rajbhasha Book (Hindi) Central Library, IIT Bhubaneswar Rajbhasha Section Central Library, IIT Bhubaneswar Rajbhasha Section RB 891.433 YAD/E (Browse shelf(Opens below)) Available RB1587
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Hindi novel focusing on family relationships, marriage, women, ageing parents, and changing social values.

'एक कहानी... खिड़की' संदीप यादव का संवेदनशील हिन्दी उपन्यास है, जिसमें 'खिड़की' को परिवार के भीतर और बाहर के वातावरण के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाले प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेखक खिड़की के रूपक के माध्यम से पत्नी, परिवार और रिश्तों में संतुलन की भूमिका को समझाते हुए भारतीय पारिवारिक जीवन की अनेक जटिलताओं को सामने लाते हैं। कथा एक ऐसे बुजुर्ग दंपती और उनके बच्चों के परिवार के इर्द-गिर्द विकसित होती है, जिन्होंने सीमित साधनों में अपने बच्चों का पालन-पोषण कर उन्हें स्थापित किया है। समय के साथ परिवार में बढ़ती अपेक्षाएँ, तुलना, प्रतिस्पर्धा, आपसी अविश्वास, बहुओं और सास-ससुर के बीच उत्पन्न मतभेद तथा पीढ़ियों के बदलते दृष्टिकोण उनके जीवन में तनाव पैदा करते हैं। रचना में दांपत्य संबंध, स्त्री की पारिवारिक भूमिका, बुजुर्गों की उपेक्षा, संयुक्त परिवार के बदलते स्वरूप और सामाजिक मूल्यों में हो रहे परिवर्तन का मार्मिक चित्रण किया गया है। 'खिड़की' यहाँ केवल घर का वास्तु-तत्व नहीं, बल्कि प्रेम, संवाद, त्याग, अपनत्व और दो पीढ़ियों के बीच संबंधों को जोड़ने वाले भावनात्मक सेतु का प्रतीक बन जाती है। यह कृति पाठकों को परिवार में सामंजस्य, सम्मान, संवेदना और आपसी संवाद के महत्व पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।

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