| 000 | 02660 a2200253 4500 | ||
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| 001 | RB1567 | ||
| 003 | IN-BhIIT | ||
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| 020 | _a9789350000571 (paperback) | ||
| 040 | _aIN-BhIIT | ||
| 041 | _ahin | ||
| 082 |
_a891.433 _bPAR/T |
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| 100 |
_aParsai, Harishankar, _eauthor. _924233 |
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| 245 |
_6880-02 _aTat ki khoj : _blaghu upanyasa / _cHarishankar Parsai. |
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| 260 |
_aNew Delhi : _bVani Prakashan, _c2009. |
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| 300 |
_a107 pages ; _c21 cm. |
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| 500 | _aHindi novella dealing with marriage, social expectations, economic hardship, and the position of women in society. | ||
| 520 | _a'तट की खोज' हरिशंकर परसाई का एक संवेदनशील लघु उपन्यास है, जिसमें एक शिक्षित युवती और उसके परिवार के जीवन के माध्यम से विवाह, सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक कठिनाइयों तथा स्त्री की स्वतंत्रता से जुड़े प्रश्नों को प्रस्तुत किया गया है। कथा में विवाह के लिए लड़की को देखने की सामाजिक परंपरा, दहेज और आर्थिक अपेक्षाओं, अविवाहित स्त्री के प्रति समाज की दृष्टि तथा परिवार पर पड़ने वाले मानसिक दबाव का मार्मिक चित्रण मिलता है। लेखकीय संवेदना के माध्यम से रचना यह प्रश्न उठाती है कि स्त्री के जीवन और भविष्य का निर्णय सामाजिक रूढ़ियों और आर्थिक सामर्थ्य के आधार पर क्यों किया जाए। यह कृति पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था, विवाह संस्था और स्त्री-अस्मिता पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत करती है। | ||
| 650 |
_aHindi fiction. _916150 |
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| 650 |
_aMarriage _zIndia _vFiction. _928317 |
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| 880 |
_6245-02 _aतट की खोज : _bलघु उपन्यास / _cहरिशंकर परसाई. |
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| 942 | _cRB | ||
| 999 |
_c15616 _d15616 |
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