| 000 | 01568 a2200229 4500 | ||
|---|---|---|---|
| 001 | RB1540 | ||
| 003 | IN-BhIIT | ||
| 005 | 20260603183614.0 | ||
| 008 | 260603b |||||||| |||| 00| 0 eng d | ||
| 020 | _a9789350480588 (hbk.) | ||
| 040 | _aIN-BhIIT | ||
| 041 | _ahin | ||
| 082 |
_a921 _bTIW/S |
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| 100 |
_aTiwari, Arun _eAuthor _915995 |
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| 245 |
_6880-02 _aSukrat / _cArun Tiwari |
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| 260 |
_aNew Delhi : _bPrabhat Prakashan, _c2011. |
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| 300 |
_a128 p. : _bill. ; _c21 cm. |
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| 504 | _aIncludes bibliographical references and index. | ||
| 520 | _aदुनिया भर के दार्शनिकों में सुकरात का विशिष्ट स्थान है। उनमें सोचने-समझने की क्षमता थी और वह सत्य एवं न्याय की खोज के प्रति दृढ़-संकल्प थे। वह मानते थे कि एक बेहतर विश्व की कल्पना तभी साकार हो सकती है, जब लोग समझदार एवं बुद्धिमान हों। हमें किसी दूसरे के विचारों को यूँ ही स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए, बल्कि उनको आलोचनात्मक तर्क की कसौटी पर परखना चाहिए। | ||
| 880 |
_6100-02 _aसुकरात / _cअरुण तिवारी |
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| 942 | _cRB | ||
| 999 |
_c15408 _d15408 |
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