| 000 | 02187 a2200229 4500 | ||
|---|---|---|---|
| 001 | RB1526 | ||
| 003 | IN-BhIIT | ||
| 005 | 20260515161655.0 | ||
| 008 | 260515b |||||||| |||| 00| 0 eng d | ||
| 020 | _a9788126704910 (hbk.) | ||
| 040 | _aIN-BhIIT | ||
| 041 | _ahin | ||
| 100 |
_aPant, Sumitranandan _eAuthor _927792 |
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| 245 |
_6880-02 _aChidambara / _c Sumitranandan Pant |
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| 250 | _a16th ed. | ||
| 260 |
_aNew Delhi : _bRajkamal Prakashan, _c2024. |
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| 300 |
_a351 p. : _bill. ; _c20 cm. |
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| 504 | _aIncludes bibliographical references and index. | ||
| 520 | _aछायावाद के प्रमुख स्तम्भ सुमित्रानंदन पंत की काव्यचेतना का प्रतिबिम्बन है ‘चिदंबरा’। इसमें कवि के 1937 से 1957 तक की बीस वर्षों की विकास-यात्रा की झलक मिलती है। स्वयं पंत ने स्वीकार किया है कि ‘चिदंबरा’ में उनकी भौतिक, मानसिक, आध्यात्मिक संचरणों से प्रेरित आन्तरिक लयबद्धता व्याप्त है। ‘युगवाणी’ से लेकर ‘अतिमा’ तक की रचनाओं के इस संचयन में पंत की काव्य-चेतना का संचरण ‘चिंदबरा’ में परिलक्षित होता है। पंत ने भौतिक और आध्यात्मिक दोनों दर्शनों से जीवनोपयोगी तत्त्वों को लेकर अपनी रचनाओं में भरे-पूरे मनुष्यत्व का निर्माण करने का प्रयास किया है जिसकी आवश्यकता आज भी बनी हुई है। | ||
| 880 |
_6100-02 _aचिदंबरा / _cसुमित्रानंदन पंत |
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| 942 | _cRB | ||
| 999 |
_c15374 _d15374 |
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