| 000 | 07214 a2200241 4500 | ||
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| 003 | IN-BhIIT | ||
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| 020 | _a9789360864149 (pbk.) | ||
| 040 | _aIN-BhIIT | ||
| 041 | _aeng | ||
| 082 |
_a891.433 _bJAI/C |
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| 100 |
_aJaiswal, Chandrakishore _eAuthor _926267 |
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| 245 |
_6880-02 _aChiranjeev / _cChandrakishore Jaiswal. |
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| 260 |
_aNew Delhi : _bRajkamal Prakashan, _c2024. |
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| 300 |
_a824 p. : _c20 cm. |
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| 500 | _aचन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकिशोर जायसवाल का जन्म 15 फरवरी, 1940 को बिहार के मधेपुरा जिले के बिहारीगंज में हुआ। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय, पटना से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर शिक्षा हासिल की और अरसे तक अध्यापन करने के बाद भागलपुर अभियंत्रण महाविद्यालय, भागलपुर से प्राध्यापक के रूप में सेवानिवृत्त हुए। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं—‘गवाह गैरहाजिर’, ‘जीबछ का बेटा बुद्ध’, ‘शीर्षक’, ‘चिरंजीव’, ‘माँ’, ‘दाह’, ‘पलटनिया’, ‘सात फेरे’, ‘मणिग्राम’, ‘भट्ठा’, ‘दुखग्राम’ (उपन्यास); ‘मैं नहिं माखन खायो’, ‘मर गया दीपनाथ’, ‘हिंगवा घाट में पानी रे!’, ‘जंग’, ‘नकबेसर कागा ले भागा’, ‘दुखिया दास कबीर’, ‘किताब में लिखा है’, ‘आघातपुष्प’, ‘तर्पण’, ‘जमीन’, ‘खट्टे नहीं अंगूर’, ‘हम आजाद हो गए!’, ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह); ‘शृंगार’, ‘सिंहासन’, ‘चीर-हरण’, ‘रतजगा’, ‘गृह-प्रवेश’, ‘रंग-भंग’ (नाटक); ‘आज कौन दिन है?’, ‘त्राहिमाम्’, ‘शिकस्त’, ‘जबान की बन्दिश’ (एकांकी)। उनके उपन्यास ‘गवाह गैरहाजिर’ पर राष्ट्रीय फ़िल्म विकास निगम द्वारा निर्मित फ़िल्म ‘रूई का बोझ’ और कहानी ‘हिंगवा घाट में पानी रे!’ पर दूरदर्शन द्वारा निर्मित फ़िल्में काफी चर्चित रही हैं। ‘रूई का बोझ’ नेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल पैनोरमा (1998) के लिए चयनित हुई थी और अनेक अन्तरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सवों में प्रदर्शित हो चुकी है। उन्हें ‘रामवृक्ष बेनीपुरी सम्मान’, ‘बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान’, ‘आनन्द सागर कथाक्रम सम्मान’, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के ‘साहित्य साधना सम्मान’ और बिहार सरकार के ‘जननायक कर्पूरी ठाकुरी सम्मान’ से सम्मानित किया गया है। | ||
| 520 | _aपरम्परा और आधुनिकता का समन्वय करते हुए लोक-मन और उसमें प्रवाहित करुणा के सामाजिक भाव को अपनी रचनाओं में समेटकर जीवन की गाथाएँ रचने वाले चन्द्रकिशोर जायसवाल का यह उपन्यास पारिवारिक जीवन के सौन्दर्य को इतने विस्तार और बारीकी से सम्भवत: पहली बार अपने कथानक का विषय बनाता है। कथानक के केन्द्र में शशांक, दिव्या और इस दम्पति का पुत्र टीपू हैं। इन्हीं पात्रों और इनके जीवन के बहाने लेखक ने इस उपन्यास में ग्रामीण और कस्बाई जीवन के छोटे-छोटे ब्योरों से यह कथा बुनी है जो दरअसल भारत के समूचे लोक-परिवेश का महाख्यान है। यह उपन्यास सम्बन्धों के जटिल संजाल के साथ लोक की उस ऊष्मा को भी पुनर्जीवित करता है, जो हमारे आधुनिक समय के हाशिये पर उपेक्षित जा पड़ी है। विवरण-सघनता इस उपन्यास में एक तरफ अगर लेखक की विशाल अनुभव-सम्पदा का प्रमाण है तो दूसरी तरफ उसकी रचनात्मक ऊर्जा का भी साक्ष्य है। यही वह भूमि है जो इस उपन्यास को अनूठा और दुर्लभ बनाती है, और जिससे गुजरते हुए पाठक इसके संसार का हिस्सा हो जाता है। जिजीविषा के साथ यह उपन्यास मृत्यु को भी अपने कथ्य की परिधि में समेटता है, लेकिन जीवन की तलाश उसके परे भी जारी रहती है। निस्सन्देह इस उपन्यास में वह सब है जिसकी अपेक्षा एक विधा के तौर पर उपन्यास से की जाती है। | ||
| 650 |
_aHindi novel _917397 |
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| 880 |
_6100-01 _aचिरंजीव / _cचंद्रकिशोर जायसवाल के द्वारा। |
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| 942 | _cRB | ||
| 999 |
_c14940 _d14940 |
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