000 02978 a2200229 4500
001 RB1486
003 IN-BhIIT
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020 _a9788119127306 (hbk.)
040 _aIN-BhIIT
041 _aeng
082 _a928.54
_bRAI/K
100 _aRai, Rajendra Chandrakant
_eAuthor
_926264
245 _6880-02
_aKaal ke kapal par hastakshar :
_bharishankar parsai ki pramanik jeevani /
_cRajendra Chandrakant Rai.
260 _aNoida :
_bSetu Prakashan Pvt. Ltd.,
_c2023.
300 _a664 pages :
_c20 cm.
520 _aइस जीवनी में परसाई के अलक्षित जीवन प्रसंगों को पढ़ना रोमांचकारी है। इसमें लक्षित परसाई से कहीं अधिक अलक्षित परसाई हैं जिन्हें जाने बिना वह चरितव्य समझ नहीं आएगा, जो परसाई के मनुष्य और लेखक को एपिकल बनाता है। जीवनी जीवन चरित है। ये गद्य और पद्य दोनों में लिखी गयी हैं। संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश में जीवनीपरक साहित्य का इतिहास उपलब्ध है। यूरोप में विलियम रोपर ने ब्रिटिश राजनीतिज्ञ सर थामस मूर की जीवनी 1626 में लिखकर इस विधा की शुरुआत की । भारतेन्दु, हाली, बालमुकुन्द गुप्त, शिवपूजन सहाय से लेकर अमृत राय, रामविलास शर्मा, विष्णु प्रभाकर, शरद दत्त के आगे तक जीवनीकारों की एक समृद्ध परम्परा दृश्य में है। कह सकते हैं परसाई की जीवनी को इस क्रम में शुमार किया जा सकता है। यह आज़ादी के पूर्व और बाद का सृजनात्मक इतिहास है और परसाई की भूमिका और अवदान पर यह कृति समावेशी रोशनी डालती है। - लीलाधर मंडलोई
650 _aAutobiography
_920592
880 _6100-01
_aकाल के कपाल पर हस्ताक्षर :
_bहरिशंकर परसाई की प्रामाणिक जीवनी।
_cराजेंद्र चंद्रकांत राय के द्वारा।
942 _cRB
999 _c14887
_d14887